
“भारत खेलों में पीछे क्यों है?”
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भूमिका (Introduction)
भारत एक युवा देश है। आज भारत की 65% से ज़्यादा आबादी 35 साल से कम उम्र की है। इतनी बड़ी युवा शक्ति होने के बावजूद, जब हम ओलंपिक, एशियन गेम्स या वर्ल्ड लेवल टूर्नामेंट्स देखते हैं, तो एक सवाल बार-बार दिमाग में आता है — “भारत क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों में पीछे क्यों है?”
क्रिकेट में भारत विश्व शक्ति है, लेकिन हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, रेसलिंग, तैराकी, टेनिस, बैडमिंटन जैसे खेलों में हम कभी-कभी ही चमकते हैं। यह सिर्फ खिलाड़ियों की गलती नहीं है, बल्कि एक पूरी सिस्टम फेलियर की कहानी है।
इस ब्लॉग में हम ईमानदारी से कारण, जमीनी सच्चाई और व्यावहारिक समाधान पर बात करेंगे।
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1️⃣ भारत में क्रिकेट ही सब कुछ क्यों बन गया?

🔹 1.1 इतिहास और मीडिया का रोल
क्रिकेट को भारत में लोकप्रियता अंग्रेजों के ज़माने से मिली। 1983 का वर्ल्ड कप जीतने के बाद क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, धर्म बन गया।
मीडिया ने क्रिकेट को इतना दिखाया कि बाकी खेल पीछे छूट गए। आज भी:
न्यूज़ चैनल = क्रिकेट
विज्ञापन = क्रिकेटर
स्पॉन्सर = क्रिकेट
👉 नतीजा: बाकी खेलों को पहचान ही नहीं मिलती।
🔹 1.2 पैसा और स्टार कल्चर
जहाँ क्रिकेट में एक खिलाड़ी करोड़पति बन सकता है, वहीं अन्य खेलों में:
खिलाड़ी नौकरी के लिए संघर्ष करता है
परिवार सपोर्ट नहीं करता
समाज कहता है: “क्रिकेट खेलो, वरना पढ़ाई करो”
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2️⃣ स्कूल और कॉलेज सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी
🔹 2.1 पढ़ाई > खेल
भारत में बचपन से सिखाया जाता है:
> “खेल से पेट नहीं भरता”
स्कूलों में:
खेल पीरियड नाम का होता है, असल में नहीं
ग्राउंड नहीं होते
PT टीचर सिर्फ हाज़िरी लेता है
🔹 2.2 टैलेंट की पहचान ही नहीं होती
विदेशों में:
6–7 साल की उम्र में टैलेंट पहचान
स्पोर्ट्स साइंस सपोर्ट
भारत में:
गांव का टैलेंट गांव में ही मर जाता है
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3️⃣ खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधा की कमी
🔹 3.1 ग्राउंड और ट्रेनिंग की हालत
भारत में:
क्रिकेट के लिए स्टेडियम
बाकी खेलों के लिए टूटी-फूटी सुविधा
कई जगह:
रनिंग ट्रैक नहीं
स्विमिंग पूल नहीं
जिम और रिकवरी सिस्टम नहीं

🔹 3.2 कोचिंग क्वालिटी की कमी
अक्सर कोच:
पुराने ज़माने की ट्रेनिंग देते हैं
स्पोर्ट्स साइंस नहीं जानते
खिलाड़ियों की मेंटल हेल्थ नहीं समझते
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4️⃣ राजनीति, भ्रष्टाचार और सिफारिश
🔹 4.1 टैलेंट नहीं, पहचान चलती है
कई खेलों में:
सेलेक्शन पैसे से
सिफारिश से टीम
👉 इससे असली खिलाड़ी टूट जाता है।
🔹 4.2 फेडरेशन की नाकामी
भारत में कई स्पोर्ट्स फेडरेशन:
सालों से वही लोग
कोई अकाउंटेबिलिटी नहीं
खिलाड़ी की आवाज़ नहीं
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5️⃣ समाज और पैरेंट्स की सोच
🔹 5.1 रिस्क लेने से डर
पैरेंट्स सोचते हैं:
खेल = अनिश्चित भविष्य
पढ़ाई = सुरक्षित नौकरी
जब तक परिवार सपोर्ट नहीं करेगा, खिलाड़ी कैसे आगे बढ़ेगा?
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6️⃣ तुलना: विदेश बनाम भारत
🇺🇸 अमेरिका
स्कूल से स्पोर्ट्स स्कॉलरशिप
कॉलेज = प्रोफेशनल लीग का रास्ता
🇨🇳 चीन
स्टेट सपोर्ट
फुल टाइम एथलीट सिस्टम
🇯🇵 जापान
डिसिप्लिन
स्कूल लेवल पर प्रो ट्रेनिंग
👉 भारत अभी सिर्फ कोशिश में है।
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7️⃣ अब समाधान क्या है? (सबसे ज़रूरी हिस्सा)
✅ 7.1 स्कूल लेवल से बदलाव
हर स्कूल में कंपल्सरी स्पोर्ट्स
टैलेंट आइडेंटिफिकेशन प्रोग्राम
✅ 7.2 क्रिकेट के अलावा खेलों को भी पैसा
लीग सिस्टम (जैसे PKL)
मीडिया कवरेज
✅ 7.3 कोच और स्पोर्ट्स साइंस
इंटरनेशनल कोच
न्यूट्रिशन, रिकवरी, मेंटल ट्रेनिंग
✅ 7.4 पैरेंट्स और समाज की सोच बदलना
खेल भी करियर है
एक खिलाड़ी देश का नाम रोशन करता है
✅ 7.5 सरकार और पॉलिसी
Khelo India जैसे प्रोग्राम
ग्राउंड लेवल मॉनिटरिंग
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8️⃣ भविष्य: क्या भारत बदल सकता है?

हाँ, बिल्कुल!
नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधु, मैरी कॉम, बजरंग पुनिया जैसे खिलाड़ी बताते हैं कि टैलेंट की कमी नहीं है, सिस्टम की कमी है।
अगर:
ईमानदार सिस्टम बने
खिलाड़ियों को सम्मान मिले
खेल को करियर माना जाए
तो भारत सिर्फ क्रिकेट में नहीं, हर खेल में विश्व गुरु बन सकता है।
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निष्कर्ष (Conclusion)
भारत का खेलों में पीछे रहना किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई सालों की गलत सोच, कमजोर सिस्टम और क्रिकेट-केंद्रित संस्कृति का नतीजा है।
अब समय है कि:
हम सवाल पूछें
सिस्टम सुधारें
और हर खेल को समान मौका दें
तभी असली “स्पोर्टिंग इंडिया” बनेगा।
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